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लोग उसका रूप याद रखते हैं। पर उसका साहस भूल जाते हैं।
शकुंतला और दुष्यंत प्राचीन भारतीय कथा का एक साहित्यिक पुनर्कथन है, जिसमें शकुंतला को केवल सौंदर्य, प्रेम और विरह की प्रतीक के रूप में नहीं, बल्कि अपने निर्णय स्वयं लेने वाली एक विवेकशील, साहसी और स्वाभिमानी स्त्री के रूप में देखा गया है।
कण्व के आश्रम में पली शकुंतला का जीवन तब बदलता है जब राजा दुष्यंत उसके संसार में प्रवेश करते हैं। प्रेम जन्म लेता है, लेकिन उसके साथ प्रश्न भी आते हैं—वचन का मूल्य क्या है? सत्ता के सामने सत्य की क्या जगह है? और जब स्मृति, परिस्थिति और राजधर्म एक-दूसरे से टकराएँ, तो न्याय किसे कहा जाए?
महाभारत और महाकवि कालिदास की कथा-परंपरा से प्रेरित यह उपन्यास प्रेम के साथ-साथ आत्मसम्मान, उत्तरदायित्व, मातृत्व, क्षमा और अपने सत्य पर अडिग रहने की कथा भी है।
यह किसी प्राचीन ग्रंथ का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि आधुनिक हिंदी पाठक के लिए लिखा गया एक साहित्यिक पुनर्कथन है।
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