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त्रिवेणी: एक आदर्श बहू ले 'बेकार' बहू बने के डगर"
का कोनो 'आदर्श' बहू के जिनगी म सिरिफ़ त्याग अउ समझौता ही लिखे होथे? या ओकर घलो कोनो अस्तित्व हे?
छत्तीसगढ़ी साहित्य के सोंधवा खुशबू म सजे, ये कहानी आय त्रिवेणी के। ओ त्रिवेणी, जेहा अपन घर-परिवार ला स्वर्ग बनाय बर अपन हर खुसी, अपन हर सपना के तयाग कर दीस। एक अइसन आदर्श बहू, जेकर तयाग के कोनो मोल नई समझिस।
जब सहनशक्ति के बांध टुटथे अउ ममता के जगह स्वाभिमान ले लेथे, त ये समाज अउ परिस्थिति ह ओला बदले बर मजबूर कर देथे। तब दुनिया ओला ‘खराब’ या ‘बेकार’ कहे बर धर लेथे। फेर का ओ वाक़ई खराब हे? या ये ओकर अंतस के अंजोर अउ मया क कहानी आय?अपन अंतर्मन के पीरा अउ एक आदर्श बहू से बेकार बहू बनने तक के ये संघर्ष भरे डगर ला बड़ साहित्यिक रूप म उकेरे गे हे। नारी मन के ओ आंसु अउ सिसकी जेला अक्सर चूल्हा-चौका के धुआं म दबा दिए जाथे, ओकर ये मर्मस्पर्शी अउ जीवंत उपन्यास आय.
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