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"आईना” मन का दर्पण है—एक ऐसी काव्य यात्रा, जो व्यक्ति को अपने ही भीतर झाँकने के लिए प्रेरित करती है। यह कविता उन अनदेखे विचारों, द्वंद्वों और भावनाओं को सामने लाती है, जिन्हें हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। हर पंक्ति एक प्रतिबिंब है, जो हमें हमारी सच्चाई से रूबरू कराती है—चाहे वह सुखद हो या असहज। यह केवल बाहरी दुनिया को देखने की नहीं, बल्कि अपने भीतर के चेहरे को पहचानने की बात करती है। “आईना” हमें ठहरने, सोचने और स्वयं से संवाद करने का अवसर देता है। यह बताता है कि जब तक हम अपने भीतर के सच को नहीं देखेंगे, तब तक बाहरी दुनिया को समझ पाना अधूरा ही रहेगा। अंततः, यह कविता आत्मबोध की ओर पहला कदम बन जाती है।
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