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‘स्वस्ति अगीत’ अगीत विधा की अद्वितीय, अनुपम कृति है। ‘स्वस्ति’ का अर्थ है मंगल, कल्याण, जबकि अगीत का निहितार्थ है परंपरागत गीत की सीमाओं से मुक्त काव्य। यह संग्रह केवल काव्यात्मक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक घोषणापत्र के रूप में सामने आता है, जिसमें भारतीय दार्शनिक परंपरा, राष्ट्रप्रेम, सांस्कृतिक पुनर्जागरण तथा मानवीय मूल्यों का पुनर्स्थापन और समकालीन प्रासंगिकता का आलोचनात्मक विवेचन किया गया है।
संग्रह का सबसे प्रभावशाली पक्ष इसका राष्ट्रधर्मी स्वर है। राष्ट्रधर्म सांस्कृतिक पुनर्जागरण की अवधारणा पर आधारित है। राजेश जी भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों को राष्ट्रनिर्माण का आधार मानते हैं। वे व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र और विश्व को एक क्रमिक विकास-यात्रा के रूप में देखते हैं तथा आत्मसंस्कार को सर्वाेच्च मानते हैं।
‘स्वस्ति अगीत’ का सबसे बड़ा वैशिष्ट्य इसकी वैचारिक प्रखरता है। यह संग्रह भावुकता की अपेक्षा विचार की प्रधानता को स्वीकार करता है, किन्तु संवेदना के स्तर पर दृढ़ बना रहता है। राजेश जी का स्पष्ट मत है कि संवेदना के बिना न संस्कृति जीवित रह सकती है और न मानवता। संवेदना को वे मनुष्य की बुद्धिमत्ता और नैतिक शक्ति का आधार मानते हैं। राजेश जी की प्रत्येक कविता किसी न किसी दार्शनिक अथवा सामाजिक प्रश्न को केंद्र में रखती है। ‘योग संस्कृति’ में आत्मा को समस्त सामाजिक संस्थाओं से श्रेष्ठ माना गया है, ‘झूठ का निर्माण’ में मिथ्या भौतिक प्रपंच का विरोध है अथवा ‘सबको रुचिकर’ में सत्य की प्रतिष्ठा, ये सभी रचनाएँ विचारप्रधान हैं।
यह संग्रह अगीत विधा के मूल गुणों का प्रतिनिधित्व करता है। भाव से अधिक कथ्य पर बल, दार्शनिक और सामाजिक विरोध, बौद्धिक और तर्कप्रधान भाषा, संक्षिप्त किन्तु प्रभावशाली कथन। इस संग्रह को सांस्कृतिक काव्य की श्रेणी में स्थापित किया जा सकता है।
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