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जनरल डिब्बा

विनोद मीणा
Type: Print Book
Genre: Literature & Fiction
Language: Hindi
Price: ₹399 + shipping
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Description

मुंबई से जयपुर की ओर जाती एक ट्रेन, एक खोई हुई टिकट और जनरल डिब्बे में मिली कुछ अनजान मुलाकातें। आरव के लिए यह सफर शुरुआत में केवल घर लौटने की एक साधारण यात्रा है, लेकिन रघुवीर, सुमित और गोपाल दास से मिलने के बाद परिस्थितियाँ बदलने लगती हैं। एक रहस्यमय नीला बैग, वर्षों पुरानी यादें, एक अधूरी कहानी और अतीत से जुड़ा एक ऐसा सच, जिसे शायद समय ने बहुत लंबे समय तक छिपाकर रखा था, धीरे-धीरे इस सफर को एक रहस्य में बदल देते हैं। आरव को समझ आने लगता है कि इस डिब्बे में हुई हर मुलाकात के पीछे कोई न कोई कारण है और शायद उसका यहाँ पहुँचना भी महज एक संयोग नहीं।

“जनरल डिब्बा” केवल रहस्य और रोमांच की कहानी नहीं, बल्कि रिश्तों, इंतज़ार, बिछड़ने और इंसानियत की भी कहानी है। यह उन यात्रियों की कहानी है, जो कुछ घंटों के लिए एक-दूसरे के साथ सफर करते हैं, अपनी जिंदगी का थोड़ा-सा हिस्सा साझा करते हैं और फिर शायद अलग-अलग रास्तों पर चले जाते हैं। लेकिन कुछ मुलाकातें रास्ते में खत्म नहीं होतीं, वे हमारे भीतर अपनी जगह बना लेती हैं। जैसे-जैसे ट्रेन अपनी मंजिल की ओर बढ़ती है, पुराने सवाल सामने आते हैं, छिपे हुए सच धीरे-धीरे खुलते हैं और एक साधारण सफर कई जिंदगियों की कहानी बन जाता है। क्योंकि कभी-कभी एक टिकट केवल यात्रा का साधन नहीं होती, वह उस कहानी का दरवाज़ा होती है, जिसे पूरा होने का इंतज़ार वर्षों से था।

About the Author

विनोद मीणा का जन्म 10 अक्टूबर 1995 को जयपुर, राजस्थान के एक मध्यवर्गीय परिवार में हुआ। वर्तमान में वे मुंबई सीमाशुल्क विभाग में कार्यरत हैं। प्रशासनिक सेवा के साथ-साथ साहित्य और लेखन के प्रति उनकी गहरी रुचि रही है। उन्होंने पत्रकारिता एवं जनसंचार, अर्थशास्त्र तथा अंग्रेज़ी साहित्य में स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त की है। विभिन्न विषयों का यह अकादमिक अनुभव उनके लेखन को व्यापक दृष्टिकोण प्रदान करता है, जिसमें समाज, व्यक्ति, रिश्तों और जीवन के विविध अनुभवों की सहज अभिव्यक्ति दिखाई देती है। विनोद मीणा उन लेखकों में हैं, जो कहानी तलाशते नहीं, बल्कि ज़िंदगी के बीच से उसे सुन लेते हैं। उनकी लेखनी में आम जीवन की छोटी-छोटी घटनाओं, यात्राओं, रिश्तों और मानवीय संवेदनाओं के भीतर छिपी भावनाओं को पहचानने की विशेष क्षमता दिखाई देती है।

उनकी पहली पुस्तक “बाबूजी अभी ज़िंदा है” एक कहानी संग्रह है, जबकि “जनरल डिब्बा” उनके साहित्यिक सफ़र का एक नया पड़ाव है। उनकी रचनाओं में रिश्तों की गर्माहट, सफ़र की अनिश्चितता, अकेलापन, अपनत्व और इंसानी संवेदनाओं की गहराई सहज रूप से उभरती है। वे साधारण पात्रों और रोज़मर्रा की परिस्थितियों के माध्यम से उन भावनात्मक पक्षों को सामने लाते हैं, जिनसे पाठक स्वयं को जुड़ा हुआ महसूस करता है। उनके लिए कहानी केवल घटनाओं का क्रम नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर घटने वाली भावनाओं की यात्रा है। उनका मानना है कि एक अच्छी कहानी वही है, जो पढ़े जाने के बाद भी कुछ समय तक पाठक के भीतर चलती रहे।

ईमेल: Vinodlaxmi01@gmail.com
Instagram: @author_vinod

Book Details

ISBN: 9798237693867
Publisher: Inknest Press
Number of Pages: 204
Dimensions: 5.5"x8.5"
Interior Pages: B&W
Binding: Paperback (Perfect Binding)
Availability: In Stock (Print on Demand)

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