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रघुनंदन सहाय, नरहरपुर के पुराने हिंदी शिक्षक और पुरस्कृत उपन्यासकार, अपनी मृत्यु से पहले एक वसीयत और एक अधूरी पांडुलिपि छोड़ गए। दिल्ली की जूनियर एडिटर नीरा, उनकी भतीजी, घाट रोड के उस घर में पहुँचती है जहाँ एक टाइपराइटर, तीन निर्णायक और एक पूरा क़स्बा उसका इंतज़ार कर रहा है।
पर पांडुलिपि के हाशिये में बने त्रिकोण कुछ और कहते हैं। जिस किताब ने रघुनंदन को नाम दिया, उसे शायद किसी और ने लिखा था। शकुंतला वर्मा का नाम क्यों मिटाया गया, और जो अंत अधूरा रह गया, उसे लिखने का हक़ अब किसका है?
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