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लाहौर, जून 1947। मेयो अस्पताल की रात की पाली में एक नर्स, अमृता, और शहर के एक स्कूल का मास्टर, क़बीर, एक घायल लड़के की चारपाई के पास पहली बार मिलते हैं। बाहर शहर में आग की अफ़वाहें हैं। भीतर, दो लोग एक-दूसरे के बारे में कुछ ऐसा जानने लगते हैं जो उन्हें जानना नहीं चाहिए था। चौबीस अगस्त की एक रेलगाड़ी लाहौर से अमृतसर के लिए चलने वाली है। उस गाड़ी में एक गर्भवती औरत है, एक डॉक्टर है, और एक ऐसी साज़िश जो अस्पताल के गोदाम से शुरू हुई थी। अमृता के पास तिहत्तर दिन हैं, और हर दिन उसकी गाँठ और कसती जाती है। और सैंतालीस की उस रात के ऊपर, हानले की बर्फ़ीली वेधशाला में, कोई मशीन उसका हर क़दम गिन रही है। कालतंतु की दूसरी किताब। एक प्रेम-कथा, एक रेलगाड़ी, और वह वादा जो सरहदें नहीं पहचानतीं।
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