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रसोई जल गई। बही बच गई।
दिवाली से ठीक पहले सहाय परिवार की रसोई में आग लग जाती है। सरोज का हाथ जल जाता है, रघुवीर का भी, और जिस चूल्हे के चारों ओर पूरा परिवार जुड़ा था, वह बुझ जाता है।
राख के बीच एक सवाल खड़ा होता है: घर बेच जाए या बचाया जाए? परिवार बँटता है, कागजों की जालसाजी की परतें खुलती हैं, और बलदेव की विरासत पर सारे मोहरे हिलने लगते हैं।
तब गली आगे आती है। एक सहकारी की, कटोरियों की कतार, और हर घर से थोड़ी-थोड़ी आँच।
आख़िरी रसोई नीलसर की किताबें की अंतिम कड़ी है। यह हिसाब, हिम्मत और एक पूरी गली के साथ खड़े होने की कहानी है।
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