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माँ के नाम के पीछे एक स्त्री है।
सुधा की सिलाई मशीन से घर चलता है। तारा उसी कमरे में बड़ी होती है, जहाँ फीस की पर्ची, अधूरे कपड़े और माँ की थकान साथ रहते हैं। पिता की अनुपस्थिति के बीच बेटी दूर जाने का सपना देखती है। माँ चाहती है कि उसका रास्ता खुला रहे, पर अपने डर से लड़ना भी उसे ही है।
वर्ष बीतते हैं। तारा समझने लगती है कि माँ को चाहना और उसके जीवन पर अपना अधिकार मान लेना अलग बातें हैं। सुधा भी अपने काम, मित्रता और इच्छाओं के लिए जगह माँगना सीखती है।
उसकी माँ प्रेम, नाराजगी और छोटी कमाइयों के बीच दो स्त्रियों के अपने नाम से जीने की कहानी है।
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