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सच्चा कवच सोने का नहीं होता। मुंगेर के तीनपोल की गली में महतो मोटर गैराज का मैकेनिक दीनू — जेब में पैसे कम, दिल में दान ज़्यादा। बाबा रामेश्वर प्रसाद सिन्हा — छाती में चव्वालीस बरस से बिछड़े भाई का दर्द, और हाथ में एक पेटी की अमानत, जो १९५१ से किसी की है। जब अमरू के ऑपरेशन के सात लाख की ज़रूरत खड़ी होती है, तो सामने आती है वही पेटी — जिसमें दानवीर के कवच-कुण्डल की विरासत दफ़न है। पर उस विरासत की एक शर्त है, एक लोरी में बँधी हुई: 'जो पहनेगा वह भार पाएगा। जो सौंपेगा वह आकाश।' पैसे, इंसानियत और पुरानी कसमों के बीच — एक ऐसी कहानी जो बताती है कि असली धन वह है जो देकर भी बढ़ता है।
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