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प्रणव भू-अभिलेख कार्यालय में दूसरों की जमीन का हिसाब रखता है। रात को वह एक अनजान स्त्री का अगला दिन जीता है: पहाड़, मधुमक्खियों के छत्ते और काम के बीच गूँजता संगीत।
किरण का जीवन इतना अर्थपूर्ण लगता है कि प्रणव उसे अपनी छूटी हुई नियति मानने लगता है। उधर उसके अपने घर में वादे टूट रहे हैं, जरूरी तारीखें छूट रही हैं और बेटी उसका इंतजार कर रही है।
जब वह दूसरे जीवन का पता खोजने निकलता है, तो उसे पहली बार पूछना पड़ता है कि देखने भर से किसी पर उसका कितना हक बनता है।
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