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इतिहास दोहराता नहीं, हिसाब माँगता है।
बेतिया की मिट्टी से निकला अंगिरा — उम्र बाईस, हाथ में पुरानी बही-खाते की आदत, आँखों में बड़े शहर का ख्वाब। मादन भवन की इकतालीसवीं मंज़िल पर बैठा मादन — कारोबारी साम्राज्य का वह शीर्ष, जहाँ हर फैसला सत्ताईस साल पुराने एक हिसाब से जुड़ा है।
जब तीन लाख साठ हज़ार का एक चेक पुराने घावों को कोरेद देता है, तो धीरे-धीरे एक प्राचीन लोक-गाथा जागती है — 'दस चित्त' राजा की, जिसका अंधेरा युगों बाद एक नए रूप में लौट रहा है।
क्या अंगिरा पहचान पाएगा कि असली दशानन तलवार से नहीं, हिसाब-किताब से जन्म लेता है?
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