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गंडक के किनारे, सखुआ के जंगल में एक रात। पत्थर की वेदी के सामने एक आदमी अकेला बैठा है, और झाड़ियों से एक बाघ उसे चुपचाप देखता है। बरसों बाद बेतिया में मानस एक अस्थि-कलश और एक पुरानी पोथी के सहारे उसी रात की कहानी खोलता है। तब और अब के अध्यायों में चलती यह कथा आस्था, बलिदान और याद की है।
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