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रिटायरमेंट में इकतालीस दिन बचे हैं। उनतीस साल से एक ही थाने में तैनात दारोगा सोचता है कि अब बस पेंशन के काग़ज़ पूरे करने हैं। लेकिन एक पुराना नाम उसकी लाल डायरी से मिटता नहीं।
चंपारण के कुशहर घाट थाने में एक नई सब-इंस्पेक्टर आती है। बंद फ़ाइलों पर उसके सवाल उस ख़ामोशी को छूते हैं जिसे दारोगा बरसों से अपने भीतर ढो रहा है। जिस सच से वह बचता आया था, अब उसी का सामना करना होगा।
जब वर्दी उतारने का समय पास हो, तब उसका वादा निभाने की क़ीमत क्या होती है?
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