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बीस साल बाद, एक चिट्ठी ने उन्हें फिर उसी गली में बुला लिया।
राघव बेंगलुरु में एक सफल आदमी है, जिसके पास सब कुछ है, सिवाय सुकून के। इमरान सूरत में अपना कारखाना बचाने की जंग लड़ रहा है। नीलम पुणे के अस्पताल में दूसरों के बच्चे बचाती है, पर अपने भीतर की एक बच्ची से नज़र नहीं मिला पाती। और सुन्नू, जो आज भी उसी दुकान के काउंटर के पीछे खड़ा है, इस उम्मीद में कि किसी दिन उसके दोस्त लौट आएँगे।
मोहल्ले की उस गली में, इमली के उस पेड़ के नीचे, चारों ने बचपन में एक कसम खाई थी। एक रात, एक बारिश, एक टूटी दीवार और एक बेकसूर आदमी की चुप्पी ने उस कसम को बीस साल तक बोझ बनाए रखा।
अब गली पर नगर निगम का नोटिस लगा है। इमली का पेड़ कटने वाला है। और मास्टर जी की एक प्याली चाय के साथ वह सच फिर सामने आ रहा है, जिसे सब भूल जाना चाहते थे।
क्या देर से बोला गया सच किसी का खोया हुआ भरोसा लौटा सकता है? क्या एक गली, एक पेड़ और चार दोस्त मिलकर बीस साल पुरानी एक गलती को माफ कर सकते हैं?
मोहल्ले की वो गली दोस्ती, पछतावे और माफी की वह कहानी है, जो हर उस इंसान के भीतर कहीं रहती है जिसने कभी अपनी कोई गली छोड़ी है।
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