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दसों नायक, सेतु और बचे हुए दूत लद्दाख में इकट्ठा होते हैं। आसमान की दरार चौड़ी हो रही है और शून्य के गाँव एक-एक कर फीके पड़ रहे हैं। ज्योति-कक्ष की पहली असली बैठक में तय होता है कि हर नायक अपना घाव लेकर एक साथ चलेगा। रोहन के सामने उसकी बहन सानवी मिलती है, जो शून्य-क़िले में बंद बच्चों के बीच ज़िंदा थी। नायक शून्य-सम्राट को मारते नहीं। वे उसके दुःख तक पहुँचते हैं। क्या एक आख़िरी दीया सबके लिए काफ़ी होगा?
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