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इस बाज़ार में कोई अपना बचपन बेचता है, कोई पहली कमाई का दिन। सारंग और इनाया यहाँ एक रास्ते की तलाश में आए हैं, पर उस रास्ते की याद भी किसी और की मिल्कियत है।
एक टोकरी बुनने वाली माँ और एक कुली अपनी रखी हुई यादें वापस चाहते हैं। उनके पास पेशगी लौटाने के सिक्के नहीं हैं। सौदागर धनंजय के पास कागज़ हैं, और हर कागज़ की एक अलग व्याख्या।
घायल हाथों, सीमित धन और शाम की आख़िरी घड़ी के बीच सारंग को ऐसा सौदा करना होगा जिसमें वह केवल अपनी बात दे। किसी दूसरे का जीवन नहीं, अपना आने वाला कल नहीं। क्योंकि हर सही कीमत ताम्र में नहीं चुकाई जाती, और हर बचाव किसी का निर्णय छीनकर नहीं किया जा सकता।
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