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दत्तपुर के एक संगीत विद्यालय के पीछे तरंगिणी शिरोडकर की छोटी मरम्मतशाला है। वहाँ लौटते वाद्यों के साथ लोगों की उम्मीदें भी आती हैं। गायन शिक्षिका प्राजक्ता बर्वे जब अपने पिता का पुराना सितार लेकर पहुँचती हैं, तो सवाल केवल उसकी आवाज़ का नहीं रहता। पुरानी स्मृति और आज के उपयोग के बीच कितना बदला जा सकता है?
एक छोटे समारोह की तैयारी में कलाकारों, विद्यार्थियों और कारीगरों के रास्ते मिलने लगते हैं। अभ्यास का समय, कमरे की जगह और काम की कीमत के बीच हर व्यक्ति को अपना चुनाव करना है। यह संगीत, श्रम और उन संबंधों की कहानी है जिनमें दूसरों को सुनते हुए अपनी आवाज़ के लिए भी जगह बचानी पड़ती है।
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