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सुख-दुख की साझी "आठवाँ वचन" शृंखला का चौथा भाग है। 2005, सोनकुंड। कस्बे में नया बस-अड्डा बन रहा है और सिन्हा सदन के आँगन में दो साल का शुभांकर ओम पूरे घर की धड़कन है। तभी एक रात उसका बुख़ार उतरने से इनकार कर देता है।
अस्पताल की रोशनी, रक्त की कतार में खड़ा पूरा कस्बा, और पीली डायरी में चौथा वचन: दुख आया तो बाँट लेना, सुख आया तो बाँट देना। क्या एक घर अपना दुख इतना बाँट सकता है कि वह किसी एक पर भारी न पड़े?
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