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मुज़फ़्फ़रपुर के चतुर्भुज स्थान की एक गली में जन्मी औरत अड़तालीस साल में सात नाम पहनती है, और एक भी उसका अपना नहीं। हर नाम किसी ने रखा, हर नाम एक झूठ था, और हर झूठ किसी को ज़िंदा रखने के लिए बोला गया था। यह उद्धार की कहानी नहीं है। यहाँ कोई मसीहा नहीं आता, कोई अदालत आँसू नहीं पोंछती। यह हिसाब की किताब है। सात खंड, उनचास अध्याय, 1978 से 2026 तक।
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