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मृत्युञ्जय

शिवार्पणम
सुशील शर्मा
Type: Print Book
Genre: Religion & Spirituality
Language: Hindi
Price: ₹182 + shipping
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Description

मृत्युञ्जय
शिवार्पणम
"मृत्युञ्जय" भगवान शिव के महाकाल स्वरूप तथा भारतभूमि में प्रतिष्ठित द्वादश ज्योतिर्लिंगों को समर्पित एक भावपूर्ण काव्य कृति है। यह पुस्तक केवल शिव स्तुति का संग्रह नहीं, बल्कि शिव के विराट व्यक्तित्व, उनके दार्शनिक स्वरूप और भारतीय सांस्कृतिक चेतना में उनकी शाश्वत उपस्थिति का काव्यमय अनुभव है।
महाकाल अर्थात वह चेतना जो काल को भी अपने भीतर समाहित कर लेती है। शिव का यही स्वरूप इस कृति का केंद्रीय भाव है। वे सृष्टि के आरंभ में आदियोगी हैं, लोकमंगल के लिए विषपान करने वाले नीलकंठ हैं, तांडव में सृजन और संहार की लय हैं, तो ध्यान में आत्मशांति के प्रतीक। उनकी जटाओं से प्रवाहित गंगा जीवन की धारा है और उनके मस्तक का चंद्रमा शीतलता तथा संतुलन का संदेश देता है।
"मृत्युञ्जय" में द्वादश ज्योतिर्लिंगों की महिमा को कविता के माध्यम से अभिव्यक्त किया गया है। सोमनाथ, मल्लिकार्जुन, महाकालेश्वर, ओंकारेश्वर, केदारनाथ, भीमाशंकर, काशी विश्वनाथ, त्र्यंबकेश्वर, वैद्यनाथ, नागेश्वर, रामेश्वर और घृष्णेश्वर केवल तीर्थस्थल नहीं हैं, बल्कि भारत की आध्यात्मिक एकता और सांस्कृतिक अखंडता के उज्ज्वल प्रतीक हैं। इन ज्योतिर्लिंगों के माध्यम से शिव की ज्योति देश के विभिन्न भूभागों को एक अदृश्य आध्यात्मिक सूत्र में जोड़ती है।
इस संग्रह की कविताओं में कहीं उज्जैन के महाकाल की भस्म आरती की दिव्यता है, कहीं हिमालय की ऊँचाइयों पर विराजमान केदारनाथ की विराटता, कहीं काशी विश्वनाथ की मुक्ति चेतना, तो कहीं सोमनाथ के समुद्र तट पर अनादि शिव की अनुभूति। प्रत्येक ज्योतिर्लिंग अपने साथ एक विशिष्ट लोकविश्वास, इतिहास, प्रकृति और आध्यात्मिक संवेदना लेकर उपस्थित होता है।
पुस्तक का "मृत्युञ्जय" शीर्षक भी अपने भीतर गहरा जीवन दर्शन समेटे हुए है। मृत्यु पर विजय का अर्थ केवल देह की मृत्यु से मुक्ति नहीं, बल्कि भय, मोह, अहंकार, अज्ञान और नकारात्मकता पर विजय प्राप्त करना है। शिव का स्मरण मनुष्य को मृत्यु के भय से ऊपर उठाकर जीवन की सार्थकता का बोध कराता है। इस अर्थ में मृत्युञ्जय प्रत्येक मनुष्य के भीतर जागने वाली उस चेतना का प्रतीक है, जो विपरीत परिस्थितियों में भी आशा और आत्मबल को जीवित रखती है।
यह कृति धार्मिक आस्था के साथ साथ प्रकृति, संस्कृति, अध्यात्म और मानवीय संवेदना को भी अपने भीतर समेटती है। शिव का कैलास, गंगा, हिमालय, नदियाँ, वन, मंदिर, ज्योति और ध्वनि सभी मिलकर एक ऐसे काव्यलोक का निर्माण करते हैं, जहाँ पाठक केवल कविता नहीं पढ़ता, बल्कि शिव के विराट स्वरूप को अनुभव करने का प्रयास करता है।
"मृत्युञ्जय" उन पाठकों के लिए विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है जिनके लिए शिव केवल आराध्य नहीं, बल्कि जीवन के मार्गदर्शक हैं। यह कृति श्रद्धा को आत्मचिंतन से, भक्ति को जीवन दर्शन से और ज्योतिर्लिंगों की यात्रा को अंतर्मन की यात्रा से जोड़ती है।
अंततः यह पुस्तक एक प्रार्थना भी है और एक आत्मसंवाद भी। यह उस अनंत शिव को नमन है जो कालातीत हैं, जो संहार में भी सृजन का बीज सँजोए रखते हैं और जो मनुष्य को अंधकार से प्रकाश, भय से निर्भयता तथा मृत्यु बोध से अमर चेतना की ओर ले जाते हैं।

मृत्युञ्जय शिव की ज्योति हम सबके भीतर प्रज्वलित रहे।

हर हर महादेव।
सुशील शर्मा

About the Author

सुशील शर्मा हिंदी साहित्य के बहुआयामी रचनाकार हैं। कविता, गीत, नवगीत, लघुकथा, व्यंग्य, काव्य, आलेख तथा भारतीय संस्कृति और अध्यात्म से जुड़े साहित्यिक लेखन में उनकी सक्रिय उपस्थिति रही है। उनकी रचनाधर्मिता में भारतीय सांस्कृतिक चेतना, मानवीय संवेदना, प्रकृति, लोकजीवन, सामाजिक सरोकार और जीवन मूल्यों का सहज समन्वय दिखाई देता है।दीर्घकाल तक शिक्षा के क्षेत्र में सेवाएँ प्रदान करने के बाद उन्होंने साहित्य साधना को अपने जीवन का महत्वपूर्ण आधार बनाया। शिक्षा और साहित्य दोनों क्षेत्रों के अनुभवों ने उनके लेखन को जीवन के निकट रखा है। उनकी दृष्टि में साहित्य केवल मनोरंजन अथवा अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर संवेदना, विवेक और मानवीय मूल्यों को जागृत करने वाली शक्ति है।
उनकी प्रमुख कृतियों में मानस के राम, वैदेही की आत्म यात्रा, धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे, शिवशंकल्पमस्तु, मृत्युञ्जय, पारिजात के फूल तथा कहो तो कह दूँ गोविन्द गीत ,आधुनिक बुद्ध ओशो जैसी पुस्तकें उल्लेखनीय हैं। इन कृतियों के विषयों में रामकथा, सीता का अंतर्मन, महाभारत का धर्मदर्शन, शिवतत्त्व, ज्योतिर्लिंगों की आध्यात्मिक चेतना, प्रकृति एवं भारतीय पर्व संस्कृति तथा समकालीन सामाजिक जीवन के विविध रूप सम्मिलित हैं।
सुशील शर्मा की भाषा सहज, प्रवाहपूर्ण और संवेदनात्मक है। वे भारतीय परंपरा को केवल अतीत की स्मृति के रूप में नहीं देखते, बल्कि उसे वर्तमान जीवन से जोड़कर उसकी समकालीन प्रासंगिकता तलाशते हैं। उनकी रचनाओं में आस्था के साथ प्रश्नाकुलता, परंपरा के साथ आधुनिक दृष्टि और भावुकता के साथ जीवन का यथार्थ उपस्थित रहता है।साहित्य-सृजन के साथ उनकी रुचि साहित्यिक विमर्श, सामाजिक चेतना और सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण में भी रही है। उनका साहित्य मूलतः मनुष्य को उसके भीतर के मनुष्य से परिचित कराने का प्रयास है।सुशील शर्मा की साहित्यिक यात्रा निरंतर प्रवाहमान है। उनके लिए प्रत्येक रचना जीवन, समाज और संस्कृति को अधिक गहराई से समझने की एक नई यात्रा है।

Book Details

ISBN: 9789334464993
Publisher: सुशील शर्मा
Number of Pages: 106
Dimensions: 5.5"x8.5"
Interior Pages: B&W
Binding: Paperback (Perfect Binding)
Availability: In Stock (Print on Demand)

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