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धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे
(पुस्तक परिचय)
"धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे" केवल महाभारत के युद्ध का पुनर्कथन नहीं है, बल्कि धर्म, कर्तव्य, न्याय, सत्ता, नैतिकता और मानवीय अंतर्द्वंद्व का गंभीर विवेचन है। यह कृति पाठक को युद्धभूमि की घटनाओं से आगे ले जाकर उस मानसिक, सामाजिक और दार्शनिक संघर्ष से परिचित कराती है, जिसने महाभारत को युगों-युगों तक प्रासंगिक बनाए रखा है।
लेखक ने महाभारत के पात्रों को केवल पौराणिक चरित्रों के रूप में नहीं, बल्कि मानवीय गुण-दोषों से युक्त व्यक्तित्वों के रूप में देखा है। भीष्म का व्रत, द्रोण की दुविधा, कर्ण की निष्ठा, विदुर की नीति, कृष्ण का लोककल्याणकारी दृष्टिकोण तथा अर्जुन का विषाद—इन सबके माध्यम से यह कृति आधुनिक जीवन के प्रश्नों का भी उत्तर खोजती है।
पुस्तक का मूल संदेश यह है कि प्रत्येक युग में मनुष्य का जीवन स्वयं एक कुरुक्षेत्र है, और जब वह सत्य, न्याय एवं कर्तव्य का मार्ग चुनता है, तभी उसका जीवन धर्मक्षेत्र बनता है।
सरल किन्तु प्रभावशाली भाषा, तार्किक विश्लेषण और भारतीय सांस्कृतिक चेतना से ओतप्रोत यह कृति महाभारत के अध्येताओं, शोधार्थियों तथा सामान्य पाठकों सभी के लिए समान रूप से उपयोगी सिद्ध होती है। यह केवल इतिहास या धर्मग्रंथ की व्याख्या नहीं, बल्कि वर्तमान समाज के लिए जीवन-मूल्यों का एक सार्थक दस्तावेज है
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