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भारतीय संस्कृति में भगवान शिव केवल एक देवता नहीं, बल्कि चेतना, करुणा, वैराग्य, तप, न्याय और अनंत करुणामय संकल्प के प्रतीक हैं। उनका व्यक्तित्व जितना विराट है, उतना ही रहस्यमय भी। वे संहार के देव हैं, किन्तु उसी संहार में सृष्टि के नवोदय का बीज भी सुरक्षित रहता है। वे औघड़ भी हैं और महायोगी भी, विरक्त भी हैं और परम करुणामय भी। इसी अद्भुत व्यक्तित्व के विविध आयामों को हमारी पुराण-परंपरा ने अत्यंत मार्मिक प्रसंगों के माध्यम से अभिव्यक्त किया है।
शिव संकल्पमस्तु उन दिव्य प्रसंगों का काव्यमय नाट्य रूपांतरण है। इसका आधार श्रीरामचरितमानस, श्रीमद्भागवत महापुराण, शिवपुराण, स्कन्दपुराण तथा अन्य प्राचीन ग्रंथों में वर्णित कथाएँ हैं। यद्यपि घटनाएँ सनातन परंपरा से ग्रहण की गई हैं, तथापि उनका काव्यात्मक विन्यास, संवाद, भाव-विस्तार और मंचीय संरचना मेरी अपनी सृजनात्मक प्रस्तुति है।
इस कृति का प्रारंभ सती के मन में उत्पन्न उस सूक्ष्म संदेह से होता है, जिसने आगे चलकर उनके जीवन की दिशा बदल दी। भगवान राम की परीक्षा, शिव का मौन, सती का आत्मग्लानि से भरा अंतर्मन, दक्ष का अहंकार, यज्ञ का विध्वंस, पार्वती का कठोर तप और अंततः शिव-पार्वती का दिव्य मिलन केवल पौराणिक घटनाएँ नहीं हैं। वे मनुष्य के भीतर चलने वाले विश्वास और संशय, अहंकार और विनय, प्रेम और तप, त्याग और समर्पण के शाश्वत संघर्ष का प्रतीक हैं।
इस काव्य नाटिका की रचना करते समय मेरा उद्देश्य केवल कथा कहना नहीं था, बल्कि उन भावों को पुनर्जीवित करना था जो भारतीय संस्कृति की आत्मा हैं। मैंने प्रयास किया है कि भाषा सरल, काव्यात्मक और मंचोपयोगी रहे, ताकि सामान्य पाठक भी इसे सहज भाव से पढ़ सके और रंगमंच पर प्रस्तुति देने वाले कलाकार भी इसके संवादों और गीतों में भावाभिव्यक्ति की पूर्ण संभावनाएँ पा सकें।
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