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कभी-कभी मैं समाज को देखती हूँ, और उसमें खुद को खोजने लगती हूँ।
कभी उसकी अच्छाइयाँ प्रेरित करती हैं, तो कभी उसकी सच्चाइयाँ मन को भीतर तक छू जाती हैं। "मैं और समाज" उन्हीं एहसासों, सवालों और अनुभवों का संग्रह है जो मेरे मन में समय-समय पर जन्म लेते रहे।
इस पुस्तक की हर कविता और हर पंक्ति मेरे मन की एक छोटी-सी कहानी है—कहीं दर्द है, कहीं उम्मीद है, कहीं संघर्ष है और कहीं बदलाव का सपना। यह पुस्तक केवल मेरे विचार नहीं, बल्कि उन अनगिनत भावनाओं की आवाज़ है जिन्हें हम सब कभी न कभी महसूस करते हैं, पर शब्द नहीं दे पाते।
यदि इन पन्नों में आपको अपनी ज़िंदगी, अपने संघर्ष या अपने सपनों की झलक दिखाई दे, तो समझिएगा कि मेरी लेखनी अपने उद्देश्य तक पहुँच गई।
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