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गुजरात के प्राचीन मोढेरा सूर्य मंदिर में शोध करने पहुँची पैंतीस वर्षीय शोधकर्ता और फोटोग्राफर नयना को एक ऐसी विचित्र छाया दिखाई देती है, जो सूर्य के प्रकाश की दिशा के विपरीत चलती है।
यह रहस्यमयी सातवीं छाया उसे एक प्राचीन सूर्य-चिह्न, भूले हुए शिलालेख और सदियों से छिपाए गए ज्ञान की ओर ले जाती है। जैसे-जैसे नयना रहस्य की परतें खोलती है, इतिहास, स्थापत्य, सूर्य-विज्ञान, जल-संरक्षण और एक आधुनिक षड्यंत्र के सूत्र आपस में जुड़ते जाते हैं।
क्या सातवीं छाया केवल एक स्थापत्य रहस्य है, या वह ऐसे सत्य की रक्षा कर रही है जिसे संसार के सामने लाना खतरनाक हो सकता है?
“सूर्य मंदिर की सातवीं छाया” इतिहास और कल्पना के संगम से रचा गया एक रोमांचक ऐतिहासिक-पौराणिक रहस्य उपन्यास है।
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