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“हरयाणवी: बोली से भाषा तक का भाषाई सामर्थ्य” हरयाणवी भाषा की भाषिक संरचना, मानकीकरण, सामाजिक स्वीकृति तथा सांस्कृतिक पहचान पर आधारित एक गंभीर भाषावैज्ञानिक एवं समाजभाषावैज्ञानिक शोध-कृति है। यह पुस्तक हरयाणवी को केवल एक क्षेत्रीय बोली के रूप में नहीं, बल्कि समृद्ध व्याकरणिक संरचना, सशक्त लोकसाहित्य, व्यापक सामाजिक व्यवहार और स्वतंत्र भाषिक अस्मिता से युक्त भाषा के रूप में स्थापित करने का प्रयास करती है।
इस शोध में हरयाणवी के ऐतिहासिक विकास, ध्वन्यात्मक संरचना, शब्द-संपदा, उपबोलियों, लोक-सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों तथा आधुनिक जनसंचार माध्यमों में उसकी उपस्थिति का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। पुस्तक भाषा और बोली के पारंपरिक विभाजन पर पुनर्विचार करते हुए यह प्रतिपादित करती है कि किसी भी भाषा की पहचान उसके सामाजिक प्रयोग, साहित्यिक परंपरा और सांस्कृतिक स्वीकार्यता से निर्मित होती है।
यह कृति भाषाविज्ञान, लोकसाहित्य, समाजशास्त्र, सांस्कृतिक अध्ययन तथा क्षेत्रीय भाषा-अध्ययन से जुड़े शोधार्थियों, विद्यार्थियों और अध्येताओं के लिए एक महत्त्वपूर्ण संदर्भ-स्रोत सिद्ध होती है। साथ ही, भारतीय लोकभाषाओं के संरक्षण, संवर्धन और संवैधानिक विमर्श में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए भी यह पुस्तक अत्यंत उपयोगी और विचारोत्तेजक है।
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