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यह दुनिया एक सूखी नदिया एक काव्य-संग्रह है, जहाँ विरह, प्रेम, स्मृति, मौन, अकेलापन, प्रकृति और अस्तित्व-बोध एक-दूसरे में घुलते हुए दिखाई देते हैं। इन कविताओं में सूखी नदी केवल अभाव का प्रतीक नहीं, बल्कि उस मन की छवि है जो बहना चाहता है, ठहरता है, प्यासता है और फिर भी किसी अर्थ की खोज में आगे बढ़ता रहता है। संग्रह की कविताएँ निजी अनुभूति से आरम्भ होकर समय, मृत्यु, मोक्ष, जीवन और मनुष्य की आंतरिक यात्रा जैसे व्यापक प्रश्नों तक पहुँचती हैं। हिन्दी और उर्दू की काव्य-परंपराओं से प्रभावित भाषा में लिखी गई ये रचनाएँ शृंगार, विरह और आत्मचिंतन के बीच अपना एक सहज संसार रचती हैं। यह दुनिया एक सूखी नदिया उन भावों की पुस्तक है जो कहे जाने से पहले मौन में जन्म लेते हैं।
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