You can access the distribution details by navigating to My pre-printed books > Distribution
“मैंने मौन को बोलते सुना है”
यह काव्य-संग्रह पारंपरिक अर्थों में सुकून देने वाली कविताओं का संकलन नहीं है, बल्कि यह पाठक को उसकी अपनी वास्तविकता से रूबरू कराने का एक सशक्त माध्यम है। इसमें शामिल कविताएँ जीवन, अस्तित्व, और आधुनिक समाज की उस “सामान्यता” पर प्रश्न उठाती हैं, जिसे हम बिना सोचे-समझे स्वीकार कर लेते हैं।
यह पुस्तक उस शहर और समय की कहानी कहती है, जहाँ मनुष्य बाहर से जीवित दिखता है, लेकिन भीतर से धीरे-धीरे खाली होता जाता है। कविताएँ यह पूछती हैं कि क्या हम सच में जी रहे हैं या केवल एक तय ढर्रे पर चल रहे हैं।
इन रचनाओं में स्पष्ट उत्तर नहीं मिलते, बल्कि गहरे और असहज प्रश्न मिलते हैं, जो पाठक को सोचने और आत्ममंथन करने के लिए विवश करते हैं। भाषा यहाँ केवल अभिव्यक्ति का साधन नहीं, बल्कि एक संघर्ष है—टूटी, अधूरी और कभी-कभी जानबूझकर अस्पष्ट।
यह संग्रह निराशा का नहीं, बल्कि ईमानदारी का दस्तावेज़ है, जो झूठी आशा के बजाय सच्चाई के अंधकार को स्वीकार करने का साहस देता है।
Currently there are no reviews available for this book.
Be the first one to write a review for the book “मैंने मौन को बोलते सुना है” हिंदी कविता संग्रह.