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मनुष्य का जीवन केवल शारीरिक अस्तित्व तक सीमित नहीं है; यह विचारों, भावनाओं और ऊर्जा के एक जटिल ताने-बाने से निर्मित है। आधुनिक जीवनशैली ने हमें सुविधाएँ तो दी हैं, परंतु इसके साथ ही तनाव, चिंता, मानसिक असंतुलन और शारीरिक रोगों की संख्या भी तेजी से बढ़ी है। ऐसे समय में यह आवश्यक हो जाता है कि हम अपने भीतर झाँकें और उस मूल स्रोत को समझें जहाँ से असंतुलन उत्पन्न होता है।
यह पुस्तक “योग, प्राणायाम और भावनात्मक संतुलन: शरीर व मन की संपूर्ण चिकित्सा” इसी खोज की एक विनम्र पहल है। इसका उद्देश्य केवल योग के शारीरिक अभ्यासों को प्रस्तुत करना नहीं, बल्कि मन, शरीर और भावनाओं के गहरे संबंध को समझाते हुए एक समग्र उपचार दृष्टिकोण प्रदान करना है। इसमें यह स्पष्ट किया गया है कि हमारी भावनाएँ केवल मानसिक अनुभव नहीं हैं, बल्कि वे शरीर के विभिन्न अंगों और प्रणालियों को प्रभावित करती हैं। जब इन भावनाओं को दबाया जाता है या अनदेखा किया जाता है, तो वे धीरे-धीरे शारीरिक लक्षणों के रूप में प्रकट होने लगती हैं।
इस पुस्तक में प्राचीन योग दर्शन-जैसे चित्त-वृत्ति, पंचकोश, और चक्र प्रणाली-को आधुनिक विज्ञान के दृष्टिकोण के साथ जोड़ा गया है। साथ ही, प्राणायाम, ध्यान, माइंडफुलनेस और आत्म-जागरूकता जैसे व्यावहारिक उपकरणों के माध्यम से यह बताया गया है कि व्यक्ति अपने जीवन में संतुलन कैसे स्थापित कर सकता है। प्रत्येक अध्याय में न केवल सिद्धांतों की व्याख्या की गई है, बल्कि वास्तविक जीवन से जुड़े उदाहरणों और अनुभवों के माध्यम से उन्हें समझने का प्रयास भी किया गया है।
यह पुस्तक उन सभी लोगों के लिए है जो अपने स्वास्थ्य को केवल दवाइयों तक सीमित नहीं रखना चाहते, बल्कि उसे एक समग्र प्रक्रिया के रूप में समझना चाहते हैं। चाहे आप एक विद्यार्थी हों, पेशेवर हों, चिकित्सक हों या योग साधक-यह पुस्तक आपको अपने भीतर की यात्रा शुरू करने के लिए प्रेरित करेगी।
अंततः, यह पुस्तक केवल जानकारी देने के लिए नहीं, बल्कि परिवर्तन की दिशा में एक कदम उठाने के लिए लिखी गई है। जब हम अपने शरीर की मौन भाषा को सुनना सीखते हैं और अपनी भावनाओं को समझते हैं, तभी सच्चे अर्थों में उपचार संभव होता है।
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