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“जो लौट के फिर ना आये” महज़ एक किताब नहीं, बल्कि उन अज़ीज़ों की यादों का एक मुक़द्दस सरमाया है जो कभी हमारी ज़िंदगी का अहम हिस्सा थे और आज इस फ़ानी दुनिया से रुख़सत हो चुके हैं।
इस किताब में मुसन्निफ़ फ़ैसल आरिफ़ ने अपने उन नज़दीकी मरहूमीन रिश्तेदारों के अहवाल, उनकी शख़्सियत के रंग, और उनके साथ गुज़ारे अनमोल लम्हात को बड़ी चाबुकदस्ती और ख़ुलूस के साथ क़लमबंद किया है। यह किताब उन रिश्तों की मिठास और उनके जाने के बाद पैदा होने वाले ख़ला को गहराई से महसूस कराती है।
यह तालीफ़ उन तमाम पाठकों के दिलों को छुएगी, जिन्होंने कभी अपने किसी अज़ीज़ को खोया है और उनकी यादों को अपने सीने से लगाए बैठे हैं।
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