संजय कुमार श्रीवास्तव एक सेवानिवृत्त वरिष्ठ विद्युत क्षेत्र अधिकारी हैं, जिन्होंने अपने व्यावसायिक जीवन का महत्वपूर्ण समय Power Grid Corporation of India Limited (POWERGRID) में विभिन्न जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए व्यतीत किया। इससे पूर्व उन्होंने NTPC में भी अपनी सेवाएँ दीं और विद्युत क्षेत्र की परियोजनाओं एवं कार्यप्रणाली से जुड़े महत्वपूर्ण अनुभव प्राप्त किए। उनके व्यावसायिक जीवन में अनुशासन, कर्तव्यनिष्ठा, जिम्मेदारी, टीम भावना और निरंतर सीखने की भावना का विशेष महत्व रहा है।
व्यावसायिक जीवन के अनुभवों के साथ-साथ लेखक की रुचि भारतीय संस्कृति, आध्यात्मिक चिंतन, नैतिक मूल्यों और श्रीमद्भगवद्गीता के जीवन-दर्शन में रही है। उनके विचार में मनुष्य का जीवन केवल भौतिक उपलब्धियों, पद और आर्थिक प्रगति तक सीमित नहीं है। वास्तविक जीवन-मूल्य इस बात से भी निर्धारित होते हैं कि व्यक्ति अपने विचारों, इच्छाओं, भावनाओं और व्यवहार को किस प्रकार नियंत्रित करता है तथा अपने कर्तव्यों और जिम्मेदारियों का निर्वहन किस प्रकार करता है।
इसी चिंतन से प्रेरित होकर लेखक ने श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 16, श्लोक 21 के संदेश को आधुनिक जीवन के संदर्भमें समझने और सरल भाषा में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण काम, क्रोध और लोभ को मनुष्य के पतन की ओर ले जाने वाले तीन द्वार बताते हैं। लेखक ने इन तीनों प्रवृत्तियों को केवल धार्मिक या आध्यात्मिक दृष्टिकोण से देखने के बजाय व्यक्ति के दैनिक जीवन, परिवार, कार्यस्थल और सामाजिक व्यवहार से जोड़कर समझाने का प्रयास किया है।
लेखक का विशेष दृष्टिकोण यह है कि नकारात्मक प्रवृत्तियों से बचने का अर्थ जीवन की सभी इच्छाओं, भावनाओं या भौतिक आवश्यकताओं को समाप्त करना नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि अनियंत्रित इच्छा को संयम और संकल्प की दिशा दी जाए, क्रोध को धैर्य और संवाद में परिवर्तित किया जाए तथा लोभ के स्थान पर संतोष और उदारता विकसित की जाए। इस प्रकार उनका प्रयास केवल “त्याग” की बात करने के बजाय “त्याग नहीं, रूपांतरण” के विचार को सामने रखना है।
इस पुस्तक के माध्यम से लेखक ने आत्मनिरीक्षण को भी विशेष महत्व दिया है। उनका मानना है कि सकारात्मक परिवर्तन की शुरुआत व्यक्ति के भीतर से होती है। जब व्यक्ति अपने विचारों और व्यवहार का ईमानदारी से निरीक्षण करता है, अपनी कमजोरियों को पहचानता है और उन्हें सुधारने का प्रयास करता है, तो उसके व्यक्तिगत जीवन के साथ-साथ उसके पारिवारिक और सामाजिक संबंधों पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
लेखक का उद्देश्य किसी व्यक्ति को उपदेश देना नहीं, बल्कि श्रीमद्भगवद्गीता के इस महत्वपूर्ण संदेश पर विचार करने के लिए पाठकों को प्रेरित करना है। उनका प्रयास है कि प्राचीन ज्ञान को सरल और सहज भाषा में इस प्रकार प्रस्तुत किया जाए कि आधुनिक पाठक उसे अपने दैनिक जीवन की परिस्थितियों से जोड़ सके।
उनकी यह पुस्तक उन सभी पाठकों के लिए एक विनम्र प्रयास है, जो आत्मनिरीक्षण, आत्मसंयम, विवेक, नैतिक आचरण और जिम्मेदार जीवन की दिशा में आगे बढ़ना चाहते हैं। लेखक की आशा है कि इस पुस्तक का अध्ययन पाठकों को अपने भीतर झाँकने, अपने विचारों और कर्मों को समझने तथा जीवन में सकारात्मक परिवर्तन के लिए प्रेरित करेगा।