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मैं और तुम : मेरे ख़याल
हर मोहब्बत मुकम्मल हो, ज़रूरी तो नहीं…
कभी किसी की एक नज़र पूरी कहानी लिख देती है, कभी ख़ामोशी में कही बातें उम्रभर साथ रहती हैं। और कभी हम किसी को अपना बनाने की कोशिश करते-करते, बस उसकी यादों के होकर रह जाते हैं।
“मैं और तुम : मेरे ख़याल” एक ऐसी ही अधूरी मोहब्बत का सफ़र है—जहाँ मुलाक़ातें कम थीं, एहसास गहरे थे और कहने को बहुत कुछ था… मगर कह पाना आसान नहीं था।
कहानी के साथ जुड़ी शायरियाँ उन्हीं अनकहे जज़्बातों की आवाज़ हैं।
अगर आपने कभी किसी को ख़ामोशी से चाहा है, किसी के इंतज़ार में वक़्त गुज़ारा है, या कोई कहानी अधूरी छोड़नी पड़ी है—तो शायद इन पन्नों में आपको अपना कोई ख़याल मिल जाए।
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