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कुछ मुलाक़ातें महज़ इत्तेफ़ाक़ नहीं होतीं… वे हमारी ज़िंदगी की दिशा बदलने आती हैं।
शिमला की ठंडी हवाओं, बारिश की बूंदों और मॉल रोड की एक अनपेक्षित मुलाक़ात से शुरू होती है कबीर और अवनि की कहानी। एक तरफ़ अपने जीवन को नक़्शों और तय रेखाओं में बाँधकर चलने वाला आर्किटेक्ट कबीर, और दूसरी तरफ़ शब्दों, किताबों और बीती यादों में अपनी दुनिया तलाशती अवनि—दो बिल्कुल अलग संसार, जिन्हें एक छोटा-सा इत्तेफ़ाक़ करीब ले आता है।
चाय के कुल्हड़ों, पहाड़ी बारिश और अनकही बातों के बीच उनका रिश्ता धीरे-धीरे प्रेम में बदलता है, लेकिन गलतफ़हमियाँ, अहंकार, पारिवारिक दबाव और दूरियाँ उनके रास्ते में दीवार बनकर खड़ी हो जाती हैं। महीनों की जुदाई के बाद अधूरे सच सामने आते हैं और दोनों को यह समझना पड़ता है कि प्रेम केवल साथ पाने का नाम नहीं, बल्कि विश्वास, क्षमा और एक-दूसरे को चुनते रहने का नाम है।
‘इत्तेफ़ाक़’ एक ऐसी प्रेम कहानी है जो पूछती है—
क्या प्यार दूरी और गलतफ़हमियों की दीवारों को पार कर सकता है?
क्या एक अनपेक्षित मुलाक़ात जीवनभर का साथ बन सकती है?
यह कहानी है धड़कनों से हमसफ़र तक के उस सफ़र की, जहाँ दो मुसाफ़िर आख़िरकार एक-दूसरे में अपना घर खोज लेते हैं।
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