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खुद तक का सफर एक गहरी और भावनात्मक आत्मकथात्मक पुस्तक है जो एंग्जायटी, डिप्रेशन, अनिद्रा, आत्म-संदेह और मानसिक संघर्षों के बीच स्वयं को फिर से खोजने की यात्रा को प्रस्तुत करती है। यह केवल मानसिक स्वास्थ्य की कहानी नहीं, बल्कि टूटने, बिखरने, उम्मीद खोने और फिर धीरे-धीरे खुद तक लौटने की कहानी है।पुस्तक में लेखक अपने व्यक्तिगत अनुभवों के माध्यम से बताता है कि मानसिक संघर्ष किसी कमजोरी का संकेत नहीं, बल्कि एक मानवीय अनुभव है। यह पाठकों को यह एहसास कराती है कि अंधेरे समय में भी रिकवरी, उम्मीद और आत्म-स्वीकृति संभव है।
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