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"डर" हर किसी को लगता है, कभी अंधेरे से तो कभी किसी और चीज है अर्थात हर व्यक्ति के दिल में किसी न किसी चीज को लेकर डर जरूर होता है। मेरा उपन्यास "डर" बस ऐसे ही किसी एक डर को दर्शाता है, वह डर है शादी का डर।
जब शादी करने से इंसान डरने लगता है तो वह क्या क्या विचार अपने दिल में रखता है, वह इस डर के माध्यम से अपने समाज में शादी न करने के कारण को देखता है।
कभी कभार शादी का डर जीवन की हर खुशियां भी ले जाता है, जब शादी हो जाती है तो डर तब लगता है।
किसी को डर शादी से पहले लगता है, तो किसी को शादी के बाद तो आखिर क्यों है डर, 'शादी' के नाम से?
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