You can access the distribution details by navigating to My Print Books(POD) > Distribution
"क्या आप कभी खुद को ढूंढने निकले हैं, और रास्ते में आपको अपनी रूह मिल जाए?"
जिंदगी की उलझनों और एक गहरे इमोशनल बोझ से टूटने के बाद, कृष्णा ने अपनी सारी बेचैनी को पीछे छोड़कर 'बनारस' जाने का फैसला किया। वह वहाँ अपने अतीत को मिटाने गई थी, पर बनारस ने उसे एक नया सवेरा दे दिया।
बनारस की गंगा आरती के सुकून, मणिकर्णिका घाट की खामोशी और अस्सी घाट की उस भोर ने उसे सिखाया कि जिंदगी का आख़िरी सच क्या है। लेकिन इस सफर का असली मोड़ तब आया जब वापसी की एक अनजानी ट्रेन में उसकी मुलाकात 'अभिनव' से हुई। एक अजनबी, जो एसबीआई में मैनेजर था, पर उसके पास एक ऐसा मरहम था जिसने कृष्णा के दिल के हर जख्म को भर दिया।
बनारस के घाटों से लेकर ट्रेन के उस सफर तक... यह कहानी है उस हीलिंग की, जो किसी मंदिर या तीर्थ में नहीं, बल्कि खुद को मुसाफिर बना लेने में मिलती है।
एक ऐसी सोलो ट्रिप, जो सिर्फ एक यात्रा नहीं, बल्कि टूटने के बाद खुद को फिर से मुकम्मल करने की एक खूबसूरत दास्तान है।
Currently there are no reviews available for this book.
Be the first one to write a review for the book बनारस और वो अजनबी.