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गुलमोहरगढ़ की पंचायत। ग्यारह सदस्य, एक पुराना भवन, और रजिस्टरों की एक अलमारी जिसे बरसों से किसी ने पूरा नहीं पढ़ा।
अट्ठावन साल की लीलावती देवल, सेवानिवृत्त शिक्षिका, बारह मतों के अंतर से सरपंच चुनी जाती हैं। उनके पास कोई योजना नहीं, कोई गुट नहीं, बस एक आदत है: हर काग़ज़ को पहली पंक्ति से आख़िरी तक पढ़ना और जो समझ न आए, उसे लिख लेना। पुराने सरपंच गजराज सिंह उन्हें अनार भेंट करने आते हैं। चाय की दुकान पर एक अनाम पर्चा चिपकता है। पिछली बस्ती के पंप सूखे हैं, और किसी को ठीक से याद नहीं कि पानी का हिसाब कहाँ गया।
एक अख़बार की आधी सही ख़बर, एक बेटी का फ़ोन, और एक अविश्वास का पत्र। कहानी में कोई मुक़दमा नहीं है, कोई खलनायक नहीं। बस एक औरत है जो हर बार पूछती है, और जवाब का इंतज़ार करती है।
बीस अध्याय। एक पंचायत। और बहुत से सवाल, जो अब दर्ज हैं।
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