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ढुंगलाकोट दर्रे पर बर्फ़ ने रास्ता बंद कर दिया है। कैलासर सराय की लकड़ी की सीढ़ियाँ हर रात उन्हीं कदमों की आहट सुनती हैं - दस मुसाफ़िर, तीन सराय वाले, और एक मीनार जो सौ साल से झुकी खड़ी है।
सुबह किशोरीलाल थपलियाल उसी मीनार की सीढ़ियों के नीचे मिलते हैं। ढीला तीसरा पत्थर सब जानते थे। बाहर बर्फ़ में कोई पैरों के निशान नहीं; भीतर बंद कमरों में दस अलग-अलग सच। डाक-विभाग की सेवानिवृत्त निरीक्षक तारिणी पांडुलकर के पास न थाने का कोई सिपाही है, न शहर का कोई यंत्र - सिर्फ़ एक डायरी, एक रजिस्टर, और वह आदत जो हर काग़ज़ को उसकी जगह तक पहुँचाती है।
सोलह दिन की जाँच में हर गवाही अपना दरवाज़ा खोलती है, और हर दरवाज़े के पीछे एक और कमरा है। इकरार तो मिलता है - पर क्या इकरार ही काफ़ी है, जब सच की आख़िरी परत किसी की नहीं देखी?
बर्फ़ में बंद सराय एक बंद कमरे की वह कथा है जहाँ जवाब से ज़्यादा सवाल ईमानदार होते हैं।
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