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राम वनवास गए, पर अयोध्या का जीवन रुका नहीं। उनके जाने के बाद एक ऐसा समय आया, जब राज्य को राजा की उपस्थिति के बिना चलना था और मर्यादा को केवल स्मृति नहीं, व्यवहार में जीवित रखना था।
भरत के सामने सबसे कठिन प्रश्न था। वे सिंहासन स्वीकार किए बिना राज्य की व्यवस्था कैसे सँभालें? सत्ता उनके हाथ में थी, पर उन्होंने उसे अपना अधिकार नहीं माना। नंदीग्राम में राम की पादुकाओं को साक्षी बनाकर उन्होंने कर्तव्य, संयम और उत्तरदायित्व की एक अनूठी मिसाल प्रस्तुत की।
"पादुकाओं का गणतंत्र" रामायण के इसी कम चर्चित, किन्तु गहरे अर्थपूर्ण काल की कथा है। यह भरत के आंतरिक द्वंद्व, अयोध्या की बदलती परिस्थितियों और उस नेतृत्व की पड़ताल करती है, जो पद पर बैठे बिना भी व्यवस्था को दिशा दे सकता है।
यह पुस्तक केवल रामायण के एक प्रसंग का पुनर्कथन नहीं, बल्कि सत्ता और सेवा, अधिकार और कर्तव्य, तथा व्यक्ति की अनुपस्थिति में भी जीवित रहने वाले सिद्धांतों पर एक विचारपूर्ण साहित्यिक यात्रा है।
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