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"क्या समाज की बनाई लीक पर चलना ही एक स्त्री की एकमात्र नियति है? और अगर वह उस लीक से हटकर अपने आत्मसम्मान और अधिकारों के लिए आवाज उठाए, तो वह 'बेकार' क्यों हो जाती है?"
'त्रिवेणी: एक आदर्श बहू से बेकार बहू बनने तक का सफर' महज़ एक कहानी नहीं, बल्कि समाज के दोहरे मानदंडों को झकझोरता एक जीवंत आईना है। यह कहानी है त्रिवेणी की, जो ब्याह कर एक नए घर में कदम रखती है। शुरुआत में वह हर जिम्मेदारी को पूरी शिद्दत से निभाती है, परिवार की खुशियों के लिए खुद को झोंक देती है और समाज के तय किए गए 'आदर्श बहू' के सांचे में पूरी तरह फिट बैठती है।
लेकिन, जब वही बहू अपनी खामोशी को तोड़ती है, घर-परिवार के भीतर होने वाले मानसिक संघर्षों, अन्याय और दमन के खिलाफ खड़ी होती है, तो पल भर में समाज उसे 'बेकार बहू' का तमगा दे देता है। यह उपन्यास एक स्त्री के भीतर की पीड़ा (पीरा), उसके सब्र, और फिर उसी सब्र से जनमे आत्म-निर्भरता के विद्रोह की यात्रा है।छत्तीसगढ़ी संस्कृति की खुशबू, लोक-कहावतों, और साहित्यिक गहराई से बुना गया यह उपन्यास हर उस नारी की आवाज़ है, जिसने कभी न कभी अपनों के बीच ही अपनी पहचान को खोते हुए देखा है। क्या त्रिवेणी इस संघर्ष के बीच अपनी पहचान बचा पाएगी? जानने के लिए पढ़िए यह मर्मस्पर्शी उपन्यास।
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