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दूसरों की आँखें

संगम कृष्णा
Type: Print Book
Genre: Literature & Fiction
Language: Hindi
Price: ₹368 + shipping
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Description

इस लोक में आँख अपनी नहीं होती। अंदर उतरते ही हर एक का अपना देखना बुझ जाता है। किसी जीवित आदमी को छुओ, हाथ या कपड़ा, और ध्यान उसकी ओर लगाओ, तो उसकी आँख की दुनिया तुम्हारी हो जाती है। एक बार में एक ही आँख मिलती है, और जिसकी आँख ली है, उसकी आँख बुझी तो तुम्हारी दुनिया भी बुझ जाती है।

सारंग, इनाया, अर्यमन और श्रुति इस लोक में उतरते हैं, और सोलहवाँ द्वार खुला है, स्थिर। घाटी की इस बसाहट में हर आदमी किसी के कंधे पर हाथ रखे चलता है, और चारों के सामने एक बिछड़ा हुआ आदमी है: उसे खोजना है उस जगह, जहाँ खोजने वाले की अपनी आँख कुछ नहीं देखती।

अर्यमन की बुद्धि इस लोक का पहला हिसाब बैठाती है, और साथ-साथ उसके और सारंग के बीच एक ईंट सी रख जाती है, छोटी, पर पहली। पर उधार की आँख का हिसाब जितना साफ़ है, अपने भीतर के हिसाब उतने ही मुश्किल।

शतद्वार की सोलहवीं किताब एक सवाल रखती है: जब देखना ही दूसरों की आँख से चले, तो अपनी राह कौन देखता है? और जिसे खोया गया हो, उसे लौटाने की नज़र किसकी होती है?

About the Author

लेखक हिंदी कथा-साहित्य में कल्पना, मानवीय संबंधों और कठिन चुनावों की कहानियाँ लिखते हैं। शतद्वार उनकी कल्पना-प्रधान कथा-शृंखला है।

Book Details

Publisher: स्वप्रकाशित
Number of Pages: 394
Dimensions: 5"x8"
Interior Pages: B&W
Binding: Paperback (Perfect Binding)
Availability: In Stock (Print on Demand)

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