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धूसरपुर की छोटी नाट्य मंडली के पास छह सप्ताह हैं। पुराना हॉल छिन गया है, नया मंच छोटा है और एक अभिनेता चला गया। फिर भी कमरा नंबर सात के किरायेदार अपनी कहानी सुनाने वाले हैं।
ईशानी हर छूटा शब्द पकड़ती है। बरखा बस के टिकट काटकर आती है। करण होटल की रसोई से अपना बनारसी बचाकर लाता है। विमला बड़े अक्षरों वाला पत्र पढ़ती हैं। अनूप नई नौकरी और पहली बड़ी भूमिका के बीच खड़ा है। इनकी हँसी में थकान है, और थकान में कुछ ऐसा जो अभी हार मानना नहीं चाहता।
जब ईशानी को बरसों बाद अपने नाम से एक छोटा दृश्य पढ़ने का मौका मिलता है, उसका प्रश्न बदल जाता है। दूसरों को अगला वाक्य बताने वाली स्त्री अपना वाक्य कहाँ रखे?
दूसरी घंटी काम, परिवार और छोटे मंचों की मानवीय कथा है। यहाँ ताली के बाद भी कुर्सियाँ उठानी हैं। फिर शायद किसी नए कमरे में, किसी साथी की मदद से, एक और पंक्ति कही जा सकती है।
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