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कुछ इतवार काम के नहीं होते।
रागिनी की हर चीज़ सूची में रहती है। विवान की दुकान में हर चीज़ कभी न कभी खो जाती है। दोनों के बीच है एक आँगन, दो कुर्सियाँ और एक ऐसा बोर्ड, जो ग्राहक से ज़्यादा गलतफहमियाँ बुलाता है।
पंखे, परिवार और चाय के बीच दोस्ती बढ़ती है। फिर एक नया काम रागिनी को दूसरे शहर बुलाता है। अब मिलने से पहले पूछना पड़ेगा, और प्रेम को दोनों के कैलेंडर में अपनी जगह बनानी होगी।
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