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‘पंद्रह अक्टूबर’ प्रेम, त्याग, विरह और मर्यादा की एक ऐसी भावनात्मक कहानी है, जहाँ तीन ज़िंदगियाँ अपने-अपने हिस्से का दर्द चुपचाप सहती हैं। काव्यांजलि और देवव्रत का प्रेम ख़ामोश है, लेकिन उनके बीच रुद्रप्रताप का निःस्वार्थ त्याग और एक ऐसी परिस्थिति आ खड़ी होती है, जहाँ किसी के लिए प्रेम चुनना आसान नहीं रहता।
समय बीत जाता है, रिश्ते बदल जाते हैं और कुछ लोग हमेशा के लिए दूर चले जाते हैं। लेकिन हर वर्ष 15 अक्टूबर को आने वाला एक पत्र काव्यांजलि को उस प्रेम से जोड़े रखता है, जिसे वह अपना अतीत समझती रही थी।
फिर एक दिन आख़िरी पत्र उसके सामने वर्षों से छिपा वह सच खोल देता है, जिसे जानने के बाद उसके लिए अपने अतीत, अपने प्रेम और अपने जीवन को उसी नज़र से देख पाना संभव नहीं रहता।
यह कहानी उस प्रेम की है जो पाया नहीं गया, उस त्याग की है जिसे कभी कोई समझ नहीं पाया और उन भावनाओं की है जिन्हें शब्दों से पहले ख़ामोशी ने अपना लिया था।
‘पंद्रह अक्टूबर’ — एक ऐसी कहानी, जो पढ़ने के बाद शायद आपको अपने किसी अधूरे रिश्ते की याद दिला दे।
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