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मृत्यु के बाद पार की जाने वाली नदी का नाम तो वैतरणी है, किंतु मनुष्य अपने जीवन में भी ऐसी अनेक नदियों से गुजरता है, जिनका कोई नाम नहीं है। या शायद—उनका नाम भी वैतरणी ही है।
‘वैतरणी’ राघव और शालिनी के जीवन की ऐसी ही यात्रा है। राघव एक संवेदनशील युवक है, जिसके सपने, परिस्थितियाँ और जीवन के प्रति उसके प्रश्न उसे एक कठिन राह पर ले जाते हैं। शिक्षा, करियर, पारिवारिक अपेक्षाओं और बदलते जीवन के बीच वह अपने अस्तित्व और भविष्य का अर्थ तलाशता है।
यह उपन्यास जीवन के संघर्षों, मानवीय संबंधों और उन अनकही पीड़ाओं की कहानी है, जिनसे गुजरते हुए मनुष्य भीतर से बदलता है—और फिर भी आगे बढ़ने की उम्मीद बनाए रखता है।
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