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जिम का पहला दिन: प्रोटीन, डोले और तीसरे दिन का दर्द! (eBook)

नए-नए जोश में जिम जॉइन करने वाले देसी लड़कों की हँसाने वाली दास्तान
Type: e-book
Genre: Games, Diet & Health
Language: Hindi
Price: ₹51
(Immediate Access on Full Payment)
Available Formats: PDF

Description

संडे को जोश में जिम जॉइन किया… और तीसरे दिन शरीर ने हड़ताल कर दी!

क्या आपने भी कभी बड़े-बड़े डोले बनाने का सपना देखा है? नए जूते खरीदे, फिटनेस वीडियो देखे, प्रोटीन शेक के सपने सजाए और पहले ही दिन जिम में ऐसे पहुँचे जैसे अगले महीने बॉडीबिल्डिंग चैंपियनशिप जीतनी हो?

तो तैयार हो जाइए जिम का पहला दिन: प्रोटीन, डोले और तीसरे दिन का दर्द! के साथ हँसी से भरे एक देसी सफर पर निकलने के लिए।

इस मज़ेदार किताब में मिलेगा संडे के मोटिवेशन से लेकर मंडे के जिम एडमिशन तक का जोश, नए जूतों और ट्रेडमिल के साथ पहली मुलाकात, शीशे के सामने डोले दिखाने की कोशिश और 50 किलो उठाने के सपने के बीच 2 किलो का डम्बल देखकर मिलने वाला ज़मीनी सबक।

इसके बाद शुरू होता है प्रोटीन शेक और उबले अंडों का घरेलू महाभारत, इंस्टाग्राम रील्स के लिए वर्कआउट से ज़्यादा फ़ोटोशूट करने वालों का ड्रामा और जिम में मिलने वाले ज्ञानचंद अंकल, प्रो-ब्रो तथा हर सेट के बीच वीडियो बनाने वाले अतरंगी किरदारों की दुनिया।

लेकिन असली परीक्षा तो तीसरे दिन होती है! जब मांसपेशियों का दर्द ऐसा जवाब देता है कि बैठने, उठने और सीढ़ियाँ चढ़ने तक के लिए अलग रणनीति बनानी पड़ती है।

यह किताब उन सभी देसी लड़कों और फिटनेस के नए शौकीनों के लिए है, जो बड़े सपनों, नए जोश और थोड़ी-सी नादानी के साथ जिम की दुनिया में कदम रखते हैं।

याद रखिए—डोले एक दिन में नहीं बनते, लेकिन पहले दिन की गलतियाँ और तीसरे दिन का दर्द ज़िंदगी भर हँसाने वाले किस्से ज़रूर बन सकते हैं!

About the Author

एक हमसफ़र — नाम में रहस्य, कलम में शरारत और कहानियों में ज़िंदगी का असली मसाला!

कुछ लेखक दुनिया को गंभीर नज़र से देखते हैं, जबकि कुछ उसी दुनिया की ऐसी तस्वीर दिखाते हैं कि पाठक हँसते-हँसते अपनी कहानी उसमें पहचान लेते हैं। एक हमसफ़र की लेखकीय दुनिया रोज़मर्रा की ज़िंदगी, देसी अंदाज़, रिश्तों की उलझनों और इंसानी आदतों में छिपे हास्य से रंगी हुई है।

उनकी कहानियों में आम आदमी के बड़े-बड़े सपने भी हैं और उन सपनों के बीच आने वाली छोटी-छोटी परेशानियाँ भी। कभी मोहल्ले की बिन माँगी सलाहें, कभी प्यार की अजीब उलझनें और कभी जिम में डोले बनाने निकले नौजवान की ऐसी हालत कि सीढ़ियाँ चढ़ना भी किसी बड़े मिशन से कम नहीं लगता!

लेकिन इस नाम के पीछे की सबसे दिलचस्प बात अब भी एक सवाल है—आखिर एक हमसफ़र अपनी कहानियों के लिए इतने जाने-पहचाने किरदार कहाँ से लाते हैं? क्या ये हमारे आसपास के लोग हैं, किसी पुराने अनुभव की परछाइयाँ हैं या कल्पना की दुनिया से निकले ऐसे पात्र, जिनमें हम अपनी ही झलक देख लेते हैं?

नाम एक हमसफ़र, अंदाज़ थोड़ा रहस्यमयी और मकसद एकदम साफ़—आपके चेहरे पर मुस्कान लाना, आपकी यादों को जगाना और रोज़मर्रा की ज़िंदगी को कहानी बना देना।

Book Details

Publisher: स्व-प्रकाशित
Number of Pages: 12
Availability: Available for Download (e-book)

Ratings & Reviews

जिम का पहला दिन: प्रोटीन, डोले और तीसरे दिन का दर्द!

जिम का पहला दिन: प्रोटीन, डोले और तीसरे दिन का दर्द!

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