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संडे को जोश में जिम जॉइन किया… और तीसरे दिन शरीर ने हड़ताल कर दी!
क्या आपने भी कभी बड़े-बड़े डोले बनाने का सपना देखा है? नए जूते खरीदे, फिटनेस वीडियो देखे, प्रोटीन शेक के सपने सजाए और पहले ही दिन जिम में ऐसे पहुँचे जैसे अगले महीने बॉडीबिल्डिंग चैंपियनशिप जीतनी हो?
तो तैयार हो जाइए जिम का पहला दिन: प्रोटीन, डोले और तीसरे दिन का दर्द! के साथ हँसी से भरे एक देसी सफर पर निकलने के लिए।
इस मज़ेदार किताब में मिलेगा संडे के मोटिवेशन से लेकर मंडे के जिम एडमिशन तक का जोश, नए जूतों और ट्रेडमिल के साथ पहली मुलाकात, शीशे के सामने डोले दिखाने की कोशिश और 50 किलो उठाने के सपने के बीच 2 किलो का डम्बल देखकर मिलने वाला ज़मीनी सबक।
इसके बाद शुरू होता है प्रोटीन शेक और उबले अंडों का घरेलू महाभारत, इंस्टाग्राम रील्स के लिए वर्कआउट से ज़्यादा फ़ोटोशूट करने वालों का ड्रामा और जिम में मिलने वाले ज्ञानचंद अंकल, प्रो-ब्रो तथा हर सेट के बीच वीडियो बनाने वाले अतरंगी किरदारों की दुनिया।
लेकिन असली परीक्षा तो तीसरे दिन होती है! जब मांसपेशियों का दर्द ऐसा जवाब देता है कि बैठने, उठने और सीढ़ियाँ चढ़ने तक के लिए अलग रणनीति बनानी पड़ती है।
यह किताब उन सभी देसी लड़कों और फिटनेस के नए शौकीनों के लिए है, जो बड़े सपनों, नए जोश और थोड़ी-सी नादानी के साथ जिम की दुनिया में कदम रखते हैं।
याद रखिए—डोले एक दिन में नहीं बनते, लेकिन पहले दिन की गलतियाँ और तीसरे दिन का दर्द ज़िंदगी भर हँसाने वाले किस्से ज़रूर बन सकते हैं!
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