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इश्क़ जब इम्तिहान लेता है तो नीम सा कड़वा लगता है, जब तड़पाता है तो इमली सा खट्टा लगता है, और जब रूह में उतरता है तो शहद सा मीठा हो जाता है..."
'नीम सा कड़वा, इमली सा खट्टा, शहद सा मीठा इश्क़' सिर्फ़ कहानियों की किताब नहीं, बल्कि 70mm के पर्दे पर चलती वो छह सिनेमैटिक दास्तानें हैं, जो आपकी आँखों में आँसू और होठों पर एक ख़ामोश मुस्कान छोड़ जाएँगी।
इस संग्रह की प्रमुख दास्तानें:
पराया गुलाब: समता पार्क की बेंच पर डायरी के पन्नों में सहेजी गई एक शायर की ख़ामोश मोहब्बत की दास्तान।
श्याम दीवानी: बिहार के आंचल से लेकर वृंदावन और लंदन तक फैली विरह, समर्पण और रूहानी प्रेम की गाथा।
मसीहा: एक ख़ूँखार बागी का अपने दोस्त को दिया वो वचन, जिसने नफ़रत के बीच किताबों का चिराग़ जला दिया।
लव – इबादत: टेनिस कोर्ट और कैनवस के रंगों के बीच जन्मी वो चाहत, जिसने एक बिगड़े रईसज़ादे की ज़िंदगी बदल दी।
सपनों का साइंटिस्ट: कबाड़ की लैब में धड़कता एक जुनूनी देशभक्त दिल, जिसने आतंक के सायों को मात दी।
वायलिन: दो ख़ामोश रूहों का वो मौन संगम, जहाँ सुरों के जरिए दिल की सबसे हसीन बात कही गई।
हर कहानी में गीत, सजीव संवाद और दिल को छू लेने वाला गहरा एहसास है।
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