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Samaj ka aaina

Kiston mein bikati jindagi or sanskro ki Arthi ka sach
Veer thakur
Type: Print Book
Genre: Politics & Society
Language: Hindi
Price: ₹475 + shipping
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Description

अगर चेहरा गंदा हो, तो आईना बदलने से कुछ नहीं होता।" क्या हम वाकई एक विकसित समाज बन रहे हैं, या हम सिर्फ एक आधुनिक जंगल की ओर बढ़ रहे हैं?
'समाज का आईना' कोई साधारण काल्पनिक कहानी या सिर्फ मनोरंजन के लिए लिखी गई किताब नहीं है, बल्कि यह हमारे आस-पास बिखरे उस कड़वे सच का एक जीवंत दस्तावेज़ है जिसे हम रोज़ अपनी आँखों से देखते हैं, लेकिन चुपचाप सह जाते हैं। लेखक वीर ठाकुर ने महज़ 22 साल की उम्र में समाज के उस 'मौन' पर सीधा प्रहार किया है जिसे हमने 'सभ्यता' का नाम दे दिया है।
यह पुस्तक दो अलग-अलग हिस्सों में बंटी है, जो हमारे खोखले होते जा रहे सिस्टम और समाज के दो सबसे संवेदनशील पहलुओं को बेनकाब करते हैं:
भाग 1: समाज का आईना (राहुल का संघर्ष और व्यवस्था की धीमी हत्या)
यह कहानी डिग्रियों के बाज़ार में खड़े उस युवा 'राहुल' की पीड़ा है, जिसे हमने दिखावे की संस्कृति के बीच अकेला छोड़ दिया है। शिक्षा को व्यापार बना देने वाले कोचिंग माफ़िया, पेपर लीक का बाज़ार, और किश्तों (EMI) में बिकती ज़िंदगी के बीच घुटते हुए युवाओं का दर्द इसमें पिरोया गया है। सरकारी नौकरी की तैयारी जब महज़ एक प्रतियोगिता नहीं, बल्कि 'अस्तित्व का युद्ध' बन जाती है, तो उम्मीदों का यह भारी बोझ एक हँसते-खेलते परिवार को कहाँ ले जाता है, यह हिस्सा उसकी ज़मीनी हकीकत बयां करता है।
भाग 2: एक आशा (पूजा की अधूरी सिसकियाँ और हमारा कायर मौन)
यह हिस्सा डॉक्टर बनने का सपना देखने वाली होनहार और मासूम 'पूजा' की दास्तान है, जो अपनी सफलता की शपथ लेने वाली रात को ही सुरक्षा तंत्र की विफलता और दरिंदगी की भेंट चढ़ जाती है। यह कहानी एक बाप के संघर्ष, एक भाई के अटूट विश्वास और इंसाफ के नाम पर सिर्फ मोमबत्तियाँ जलाकर अपना फर्ज़ पूरा मान लेने वाले कायर समाज पर एक तीखा प्रहार है। यह हिस्सा हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि जब तक हम अपने बेटों को संस्कार नहीं देंगे, तब तक हमारी बेटियाँ सड़कों पर सुरक्षित कैसे होंगी?
सिर्फ़ समस्या नहीं, ठोस समाधान!
यह किताब सिर्फ सामाजिक बुराइयों और व्यवस्था का रोना नहीं रोती, बल्कि इस सड़न को जड़ से मिटाने के लिए 'पंच-समिति' और 'नगर-संसद' जैसी एक पूरी व्यावहारिक कार्य-प्रणाली का ब्लूप्रिंट सामने रखती है। यह मॉडल किसी सरकार या नेताओं के भरोसे हाथ पर हाथ धरे बैठने के बजाय, समाज को खुद अपनी ढाल और रक्षक बनाने का एक क्रांतिकारी रास्ता दिखाता है।
आपको यह किताब क्यों पढ़नी चाहिए?
वास्तविक और संवेदनशील: यह कहानी वास्तविकता के उन आँसुओं से लिखी गई है, जिसके पात्र आपको अपने ही घर, गली या आईने में खड़े दिखाई देंगे।
सोचने पर मजबूर करने वाली शायरी: पुस्तक में शामिल मूल और दिल को छू लेने वाली शायरी कहानी के मानसिक दबाव और सामाजिक हकीकत को और गहराई से बयां करती है।
बदलाव का ब्लूप्रिंट: इसमें युवाओं के रोज़गार, शिक्षा की पारदर्शिता और सामाजिक सुरक्षा के लिए बाकायदा एक व्यावहारिक और आर्थिक मॉडल चार्ट के साथ दिया गया है।
जब आप इस किताब का आखिरी पन्ना पलटेंगे, तो आपके हाथ में सिर्फ कागज़ नहीं, बल्कि समाज को बदलने की एक जलती हुई मशाल होगी।
फैसला आपका है—आपको सिर्फ एक मूकदर्शक बनकर आईना देखना है या खुद बदलाव का आईना बनना है?

About the Author

वीर ठाकुर हिंदी साहित्य, सामाजिक चिंतन और समकालीन विमर्श के क्षेत्र में एक अत्यंत संवेदनशील और प्रखर लेखक व विचारक हैं। उत्तर प्रदेश के मुज़फ्फरनगर जनपद के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध गाँव 'दूधली' की माटी में जन्मे वीर ठाकुर की जड़ें पूरी तरह से ग्रामीण परिवेश और ज़मीनी हकीकतों से जुड़ी हैं। उन्होंने अपनी बारहवीं तक की शिक्षा कला संकाय (Arts Stream) से पूरी की है, जिसने उन्हें समाज, इतिहास और मानवीय संवेदनाओं को एक अलग और गहरी दृष्टि से देखने का आधार दिया।
वीर ठाकुर के जीवन, उनके आदर्शों और उनकी सोच पर उनके पूजनीय पिताजी श्री बिजेंद्र सिंह जी का सबसे गहरा प्रभाव रहा है। उनके पिताजी मुज़फ्फरनगर रोडवेज में संविदा चालक (कॉन्ट्रैक्ट ड्राइवर) के रूप में एक बेहद कठिन, जिम्मेदारी से भरा और संघर्षमय जीवन जी रहे हैं। वीर ने बहुत करीब से देखा है कि कैसे महज़ १५ हजार रुपये की अत्यंत सीमित सैलरी में उनके पिता ने दिन-रात स्टीयरिंग थामकर, पाँच बच्चों के पूरे परिवार को पाला, सबको अच्छी शिक्षा दी और अभावों के बीच भी कभी अपने स्वाभिमान को झुकने नहीं दिया। बारहवीं पास करने के बाद जब आसपास के समाज और परिस्थितियों का यह भारी दबाव था कि अब पढ़ाई छोड़कर तुरंत कोई भी छोटी-मोटी नौकरी कर ली जाए और घर संभाला जाए, तब भी उनके पिताजी ने वीर के हौसलों को टूटने नहीं दिया। उन्होंने कभी भी वीर पर नौकरी करने का दबाव नहीं बनाया, बल्कि उन्हें अपने सपनों को जीने का हौसला और पूरी आज़ादी दी।
पिताजी के इसी त्याग, निस्वार्थ संघर्ष और समाज में एक आम इंसान के इस कठिन दौर को झेलने के बाद ही वीर ठाकुर ने यह दृढ़ संकल्प लिया कि आने वाले कल में देश का कोई भी बच्चा संसाधनों के अभाव में न रहे और किसी भी स्वाभिमानी पिता को परिस्थितियों के आगे लाचार न होना पड़े। महज़ २२ वर्ष की युवा उम्र में उनकी पहली क्रांतिकारी कृति 'समाज का आईना' इसी गहरे सामाजिक दर्द, पारिवारिक संघर्ष और वैचारिक मंथन का जीवंत परिणाम है।
वीर ठाकुर केवल सामाजिक समस्याओं को उठाने वाले लेखक नहीं हैं, बल्कि उन्होंने इस सड़न को जड़ से मिटाने के लिए अपनी पुस्तक में 'पंच-समिति' और 'नगर-संसद' जैसे अत्यंत मौलिक, आत्मनिर्भर और व्यावहारिक सामाजिक-आर्थिक सिद्धांतों का एक पूरा ब्लूप्रिंट देश के सामने रखा है। अपनी धारणदार, बेबाक और सीधी चोट करने वाली लेखन शैली तथा मर्मस्पर्शी शायरी के माध्यम से वीर ठाकुर आज के संघर्षशील युवाओं और आम जनमानस की एक सशक्त आवाज़ बनकर उभरे हैं, जो अपनी लेखनी से समाज में एक बड़ा वैचारिक इंकलाब लाना चाहते हैं।

Book Details

Publisher: Veer thakur publisher
Number of Pages: 281
Dimensions: 8.27"x11.69"
Interior Pages: B&W
Binding: Paperback (Perfect Binding)
Availability: In Stock (Print on Demand)

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